दलित, देश और संविधान

Ganpat Ram, Robert Yadav

10/14/20261 min read

कई दशकों के संघर्ष के बाद 1947 में भारत एक आज़ाद देश बना था और स्वतंत्रता की आबोहवा में देश में संविधान स्थापित हुआ और संविधान के तहत ही लोकतंत्र की स्थापना हुई और लोकतांत्रिक तरीके से देश के हर नागरिक को मतदान करने का अधिकार प्रदान किया गया और 1952 में देश का पहला चुनाव हुआ, जिसमें देश के हर वयस्क नागरिक ने मतदान किया, स्त्री और पुरुष दोनों। उस वक़्त दुनिया में भारत पहला ऐसा देश था, जिसके हर वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार प्राप्त था। उस वक़्त के शक्तिशाली देशों में भी सबको मतदान करने का अधिकार नहीं था। आज़ादी से पहले भारत में ही कई देश थे, भले ही आज के समय के अनुसार उनको देश कहना उचित नहीं होगा, लेकिन राजसत्ता के अंतर्गत उनको भी अपनी प्रभुता प्राप्त थी। उनके अपने नियम-कानून और विधि-विधान थे। लेकिन तब का भारतीय समाज भी जातियों में बँटा हुआ था और जातिगत भेदभाव चरम पर था।

उदाहरण के तौर पर, 1919 में पुणे की एक दलित महिला सड़क किनारे तरबूज बेच रही थी। तभी एक दुकानदार ने पुलिस से शिकायत कर दी कि एक दलित महिला हमारी दुकान के बगल में सड़क किनारे तरबूज बेच रही है और वह ऊँची जाति के लोगों को दूषित कर देगी। अगर किसी ने उसका तरबूज ख़रीदा तो पुलिस आई और उस दलित महिला को गिरफ्तार करके ले गई और उसके तरबूज नष्ट कर दिए। यह उदाहरण दर्शाता है कि भारत में जातिगत भेदभाव किस चरम पर था। ऐसे अनेक उदाहरण हमें मिल जाएँगे और आज भी दलितों के साथ जो अन्याय और अत्याचार हो रहा है, वह किसी से छुपा नहीं है। हमें आज़ादी मिल गई, संविधान मिल गया, देश में लोकतंत्र स्थापित हो गया, लेकिन क्या देश के दलित, आदिवासी या पिछड़े समाज के लोगों को आज़ादी का हक़ और अधिकार मिला, जिसके वे एक नागरिक के तौर पर हक़दार थे?

आज़ादी से पहले ऊँची जाति के लोगों को, ख़ासकर ज़मींदार, रजवाड़े और अंग्रेज़ों की नौकरी करने वाले लोगों को नितांत छूट और अधिकार प्राप्त था। ब्रिटिश राज ज़मींदारों और रजवाड़ों को ख़ास तवज्जो देता था और उनको विशेषाधिकार प्रदान किए हुए थे। लेकिन दूसरी तरफ़ छोटी जाति के लोगों, ख़ास करके दलित, आदिवासी, पिछड़े, वंचित और गरीब लोगों का अतिदोहन होता था। इसमें अंग्रेज़ों के साथ रजवाड़े और ज़मींदार दोनों मिलकर दोहन करते थे।

आज़ादी के बाद संविधान लागू होते ही दलित से लेकर राजा तक सब एक समान भारत के नागरिक बन गए, सबके लिए एक कानून, एक संविधान लागू हो गया। रजवाड़ों और ज़मींदारों का विशेषाधिकार छिन गया, उनका राज-पाठ और ज़मींदारी छिन गई। यही संविधान और लोकतंत्र उनके लिए दुश्मन बन गया। यही रजवाड़े और ज़मींदार इसी नफ़रत में आरएसएस और हिंदू महासभा के साथ जुड़ गए और संविधान के ख़िलाफ़ हो गए। उन लोगों के जीवन का उद्देश्य बन गया कि किसी तरह इस देश से संविधान और लोकतंत्र को ख़त्म करना है और मनुस्मृति के अनुसार राष्ट्र की परिकल्पना करने लगे।

लेकिन जब तक कांग्रेस की सरकार रही और कांग्रेस देश में मज़बूत रही, उन लोगों का सपना पूरा नहीं हो पाया, क्योंकि कांग्रेस की विचारधारा गाँधी-नेहरू की विचारधारा है और इसी विचारधारा पर इस देश का निर्माण हुआ है। लेकिन आज़ादी से पहले से सक्षम होने के कारण रजवाड़ों और ज़मींदारों ने देश के संसाधनों पर कब्ज़ा तो कर लिया, लेकिन उनका असली मकसद देश से संविधान और लोकतंत्र को ख़त्म करना पूरा नहीं हो सका। लेकिन उन लोगों ने कभी हार नहीं मानी और अपनी विचारधारा को त्यागा नहीं। उनकी विचारधारा को आरएसएस ने हमेशा जीवंत रखा।

2014 में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और संविधान-लोकतंत्र विरोधी ताक़तों ने अपने पैर फैलाने शुरू कर दिए, क्योंकि इससे अच्छा मौक़ा अब नहीं मिल सकता था उनको। संविधान-लोकतंत्र विरोधी ताक़तों ने देश की स्थापित हर संस्था में अपने लोगों को भरना शुरू किया; शिक्षा विभाग पर अपना कब्ज़ा किया, न्यायालय में अपने लोगों को न्यायाधीश बनाया, चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान में अपने लोगों को नियुक्त करके कब्ज़ा किया, पूँजीपतियों को देश की अर्थव्यवस्था सौंप दी, देश में सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न किया, जनता को धर्म के नाम पर गुमराह किया जाने लगा, लोगों में धार्मिक कट्टरता फैलाई जाने लगी। इन सबका सिर्फ़ एक मकसद है, वह है संविधान और लोकतंत्र को धीरे-धीरे ख़त्म करना। ये लोग एक बार में ख़त्म नहीं करना चाहते हैं, ताकि जनता को मानसिक आघात न लगे। ये लोग धीरे-धीरे ख़त्म करना चाहते हैं, ताकि जनता मानसिक रूप से आदी हो और उसको सदमा या आघात न महसूस हो।

इन लोगों ने 2024 का लोकसभा चुनाव राममंदिर के मुद्दे पर लड़ा और जनता से आह्वान किया कि 400 लोकसभा सीटें जीता दो, ताकि संविधान में बदलाव किया जा सके। इन लोगों के बड़े नेताओं ने खुलकर नहीं बोला, लेकिन अपने छोटे नेताओं और कार्यकर्ताओं से जनता में यह संदेश ज़रूर भेजवा दिया कि अगर 400 सीटें आ गईं तो संविधान में मूलभूत बदलाव किया जाएगा। इन लोगों ने जनता में यह संदेश देने का काम पहले से ही शुरू कर दिया था कि कांग्रेस ने देश के संविधान को गलत तरीके से लागू किया, जिसकी वजह से देश में विकास नहीं हो पाया और देश पिछड़ा ही रह गया और जनता का एक वर्ग यह मानने भी लगा और ऊँची जाति के ज़मींदार और रजवाड़े तो पहले से ही यह बात अपने लोगों में फैला रहे थे कि संविधान का लागू होना इस देश के साथ धोखा है।

लेकिन आरएसएस और भाजपा के मंसूबे कामयाब नहीं हो सके और भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई और इसका श्रेय जाता है देश के दलितों को, जिन्होंने भाजपा के ख़िलाफ़ मतदान किया और उनके मकसद पर पानी फेर दिया।

अब मुद्दा आता है कि भारत के लोकतंत्र और संविधान की रक्षा और सुरक्षा कौन कर सकता है? 2024 लोकसभा चुनावों के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि इस देश के संविधान और लोकतंत्र की रक्षा सिर्फ़ दलित, आदिवासी और पिछड़ा समाज ही कर सकता है। क्योंकि आज़ादी के बाद लोकतंत्र और संविधान से दलित, आदिवासी और पिछड़ा समाज के लोगों को ही असली फ़ायदा हुआ है; संविधान ने इस वर्ग को नागरिक होने का अधिकार दिया, कानून की सुरक्षा प्रदान की, ज़िंदगी के मौलिक अधिकार दिए, आरक्षण दिया, पढ़ने-लिखने का अधिकार दिया, सरकारी नौकरी में भागीदारी दी, आर्थिक रूप से मज़बूत होने के लिए मौक़ा प्रदान किया; ये सब हक़ और अधिकार संविधान बनने से पहले नहीं था और सत्ताधारी वर्ग ने कभी देना भी नहीं चाहा, क्योंकि उनकी विचारधारा में ही दलित, आदिवासी और पिछड़ा समाज को इंसान मानने का सिद्धांत ही नहीं है। हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के विचारक वी.डी. सावरकर ने आज़ादी के पहले ही कहा था कि दलितों और अन्य छोटी जातियों को ऊँची जाति के समान अधिकार नहीं देना चाहिए, क्योंकि ऊँची जाति का रक्त शुद्ध है और यही लोग शासक बनने के योग्य हैं।

आरएसएस और भाजपा वाले दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को समाज की मुख्यधारा से वंचित रखना चाहते हैं, संवैधानिक रूप से हर अधिकार छीन लेना चाहते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के समय अप्रैल महीने में बनारस और 2025 में प्रयागराज में संतों की “धर्म संसद” का सम्मेलन हुआ, जिसमें “हिंदू राष्ट्र” बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ और संतों ने प्रतिज्ञा ली कि हम जब तक भारत में हिंदू राष्ट्र स्थापित नहीं कर देते, तब तक रुकेंगे नहीं। यह धर्म संसद और हिंदू राष्ट्र की प्रस्तावना भाजपा सरकार की सहमति से घोषित किया गया था, क्योंकि भाजपा पार्टी और सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से आरएसएस नियंत्रित करता है और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा और विचारधारा आरएसएस की मुख्य विचारधारा है।

हिंदुत्व और आरएसएस के हिंदू राष्ट्र में दलित, आदिवासी और पिछड़ा समाज के लिए कोई हक़ नहीं, न ही वोट देने का हक़, न ही राजनीतिक और आर्थिक हक़। इनके अनुसार सिर्फ़ ऊँची जाति की सेवा करना ही दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज का कर्तव्य है। जो धर्म संसद में संतों ने हिंदू राष्ट्र की प्रस्तावना पास की, उसमें साफ़ तौर पर इंगित था कि वोट देने का अधिकार सिर्फ़ सवर्ण जाति को होगा, राज करने का अधिकार सिर्फ़ सवर्ण जाति को होगा, संविधान बनाने का अधिकार सिर्फ़ सवर्ण जाति को होगा। दलित, आदिवासी और पिछड़ा समाज सिर्फ़ सेवक की भूमिका में होगा और जाति के अनुसार काम बाँट दिए जाएँगे।

भाजपा सरकार के 12 साल की कार्यशैली और विचारधारा को देखकर भी दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के लोग नहीं जागे तो न यह देश बचेगा, न संविधान, न ही लोकतंत्र; बचेगी तो सिर्फ़ गुलामी।

इस देश की विचारधारा की नींव नेहरू, महात्मा गाँधी, डॉ. आंबेडकर, भगत सिंह, नेताजी बोस, सरदार पटेल जैसे महान आत्माओं ने रखी है और विचारधारा का आधार सत्य, अहिंसा, शांति, लोकतांत्रिक सोच, सामाजिक उत्थान जैसी सोच और कल्पना पर आधारित हैं, लेकिन आरएसएस और इससे जुड़े हुए संगठनों की विचारधारा हिंसा, हिंदुत्व, वर्ण व्यवस्था, जातिगत भेदभाव जैसे विचारों पर निहित है।

आज़ादी के बाद संविधान और लोकतंत्र का असली लाभार्थी दलित, आदिवासी और पिछड़ा समाज ही रहा है और इस देश के संविधान और लोकतंत्र की रक्षा भी दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज को ही करनी होगी; हिंदुत्ववादी विचारधारा के लोग संविधान और लोकतंत्र के हमेशा से विरोधी रहे हैं, क्योंकि हिंदुत्ववादी विचारधारा के लोगों को संविधान और लोकतंत्र ने दलित, आदिवासी और पिछड़े को बराबर लाकर रख दिया और यह बराबरी हिंदुत्ववादी लोगों को बर्दाश्त नहीं होती।

अगर बहुजन समाज अब खुलकर सामने नहीं आया तो बहुत देर हो जाएगी, क्योंकि हम देख रहे हैं कि कैसे भाजपा सरकार चुनाव आयोग का गलत तरीके से इस्तेमाल कर रही है और चुनावों में धाँधली करके राज्य दर राज्य चुनाव जीत रही है, क्योंकि भाजपा अब जान चुकी है कि जनता उनको वोट नहीं दे रही है और सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी तरह वोट हासिल करना ही होगा। और यह चुनावी धाँधली देश के बहुजनों के लिए आईना है कि अगर देश में लोकतंत्र और संविधान ख़त्म हो गया तो सत्ता किस तरह हासिल करेंगे आरएसएस के लोग।

इस देश के दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज को इस देश की रक्षा करनी होगी, संविधान और लोकतंत्र की रक्षा करनी होगी, इस देश के सच्चे देशभक्त बनकर इस देश के भविष्य को सँवारना होगा, वरना अगर देश नहीं बचेगा तो इस देश का बहुजन भी फिर से गुलाम बन जाएगा और फिर से गुलामी की भारी कीमत चुकानी होगी; फिर कोई गाँधी, नेहरू, भगत सिंह, नेताजी या आंबेडकर मिलेंगे कि नहीं, इसका कोई भरोसा नहीं है।

Ganpat Ram, Robert Yadav